सन् 1206 में, मंगोलिया की सभी प्रमुख जनजातियों को एकजुट करने के बाद, एक विशाल कुरुलताई (जनजातीय सभा) ने तेमुजिन को 'चंगेज़ खान' (समुद्र या सार्वभौमिक शासक) की उपाधि दी। यहीं से मंगोल साम्राज्य के उदय की शुरुआत हुई।
यहाँ "मंगोल: चंगेज़ खान का उदय" विषय पर हिंदी में एक संक्षिप्त पाठ प्रस्तुत है:
तेमुजिन ने एक-एक करके विरोधी जनजातियों को हराया। उसने अपने पिता के मित्र और संरक्षक तोगरिल (केराइत जनजाति के प्रमुख) तथा अपने खून के दुश्मन जमुखा के बीच कूटनीति और सैन्य कौशल से अपनी स्थिति मजबूत की। उसका सिद्धांत था - "जो मेरे साथ खड़ा हो, वह मेरा भाई है; जो मेरे विरुद्ध जाए, वह नष्ट हो जाए।" उसने अपने सैनिकों को जाति और कबीले के बजाय योग्यता के आधार पर चुना, जिससे उसकी सेना में वफादारी और अनुशासन बढ़ा।
चंगेज़ खान ने न सिर्फ युद्ध कला, बल्कि प्रशासनिक सुधार भी किए। उसने एक सशक्त सेना का गठन किया, दशमलव प्रणाली (अरबन, ज़गून, मिंगन, तुमेन) लागू की, और सख्त कानून बनाए जिन्हें 'यासा' कहा गया। उसने धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया, व्यापारियों की रक्षा की और गुप्तचरों का जाल बिछाया।
इसके बाद ही चंगेज़ खान ने चीन के जिन साम्राज्य, ख्वारज़्म, पूर्वी यूरोप और मध्य पूर्व पर विजय अभियान शुरू किए। एक विखंडित जनजातीय समूह को दुनिया के सबसे बड़े सतत साम्राज्य में बदलने की यह कहानी चंगेज़ खान के अद्वितीय नेतृत्व, दूरदर्शिता और अटूट इच्छाशक्ति का प्रतीक है।
बारहवीं सदी के अंत में मध्य एशिया के विशाल मैदानी इलाकों में बिखरी हुई मंगोल जनजातियाँ आपस में लगातार लड़ती रहती थीं। वे चरवाहे, कुशल घुड़सवार और योद्धा थे, लेकिन उनमें एकता का अभाव था। इसी अराजकता के बीच एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम तेमुजिन था।
तेमुजिन का बचपन कठिनाइयों में बीता। उसके पिता येसुगेई को जहर देकर मार दिया गया, और उसके कबीले ने उसे, उसकी माँ ओयेलुन और भाई-बहनों को अकेला छोड़ दिया। भूख, ठंड और दुश्मनों के बीच जीवित रहते हुए तेमुजिन ने संघर्ष और राजनीति का सबक सीखा। उसने जल्द ही यह समझ लिया कि शक्ति का स्रोत अकेले बल में नहीं, बल्कि वफादार साथियों और गठबंधनों में है।